एक संत ऐसा भी !!

पुरानी साड़ियों के बदले बर्तनों के लिए मोल भाव करती सम्पन्न घर की महिला ने अंततः दो साड़ियों के बदले एक टब पसंद किया। “नही दीदी, बदले में तीन साड़ियों से कम तो नही लूँगा।” बर्तन वाले ने टब को वापस अपने हाथ में लेते हुए कहा। अरे भैया, एक एक बार की पहनी हुई […]

ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍ही चदरिया

महावीर जैन नहीं हैं, महावीर जिन हैं। और जिन और जैन के अंतर को थोड़ा समझ लेना उचित है। जिन वह है, जिसने अपने को जीता; जैन वह है, जो जीतनेवाले के पीछे चलता है। गौतम बुद्ध बुद्ध हैं, बौद्ध नहीं हैं। बुद्ध वह है, जो जागा है; बौद्ध वह है, जो जागे हुए के […]

वेद विश्वकोश है

वेद में कहा है कि यज्ञ करो, तो ये फल होंगे। ऐसा दान करो, तो ऐसा स्वर्ग होगा। इस देवता को ऐसा नैवेद्य चढ़ाओ, तो स्वर्ग में यह फल मिलेगा। ऐसा करो, ऐसा करो, तो ऐसा-ऐसा फल होता है सुख की तरफ। वेद में बहुत-सी विधियां बताई हैं, जो मनुष्य को सुख की दिशा में […]

समाधि के द्वार

मैंने सुना है कि एक आदमी एक रात एक झोपड़े में बैठ कर, छोटे से दीये को जला कर कोई शास्त्र पढ़ता रहा था। फिर आधी रात गए थक गया, फूंक मार कर दीया बुझा दिया। और तब बड़ा हैरान हो गया! जब तक दीया जल रहा था, पूर्णिमा का चांद बाहर ही खड़ा रहा, […]

उस अजस्त्र जीवन-धारा की खोज

धर्म है, असीम की खोज, अनादि की खोज। जो न कभी प्रारंभ हुआ और न कभी समाप्त होगाI अस्तित्व तो अखंड है। लेकिन आदमी का छोटा सा मन उस अखंड को देख नहीं पाता। और आदमी जितना देख पाता है वह सदा ही खंड होगा। अखंड को जानने के लिए तो हृदय शून्य चाहिए। देखनेवाला […]

वासना का सजग हो जाना ही उससे मुक्ति है ….

पूरब के लोगों ने इसकी खोज की : उन्‍होंने खोज लिया कि कामवासना मृत्‍यु ज्‍यादा जल्‍दी ले आती है। इसलिए वे लोग जो ज्‍यादा दिन जीना चाहते थे, उन्‍होंने अपने कारण से, अपनी कामवासना को बिलकुल गिरा दिया था। उदाहरण के लिए, हठ योगी जो ज्‍यादा जीना चाहते है। क्‍योंकि उनके पास बड़ी धीमी गति […]

पिंजरों से संबंध

एक बार मैं अपने मित्र के साथ ठहरा हुआ था। उसके बगीचे में एक बहुत बडा पिंजरा था, और उस पिंजरे में उसके पास एक गरुड़ था। वह मुझे पिंजरे के पास ले गया और कहा ’‘ देखिए! कितना सुंदर गरुड़ पक्षी है? गरुड वास्तव में बहुत सुंदर था, लेकिन मैंने उसके लिए हृदय में […]

स्वीकार भाव

स्वीकार जादुई है. यह हमारे रूपांतरण का मंत्र है. अपने आप को पूरा स्वीकार करने का अर्थ है – अपनी देह, अपने मन, अपनी परिस्थितियों और अपने व्यक्तित्व को बिना किसी निंदा, तुलना या अहम् के स्वीकार करना और इस समझ में ठहर जाना कि इस क्षण तुम जैसे भी हो वैसे ही तुम्हें अस्तित्व […]

साधक के लिए पहली सीढ़ी

साधक के लिए पहली सीढ़ी शरीर है। लेकिन शरीर के संबंध में न तो कोई ध्यान है, न शरीर के संबंध में कोई विचार है। और थोड़े समय से नहीं, हजारों वर्षों से शरीर उपेक्षित है। यह उपेक्षा दो प्रकार की है। एक तो उन लोगों ने शरीर की उपेक्षा की है, जिन्हें हम भोगी […]

इस जीवन में मैंने दुख ही दुख क्यों पाया है?

दुख ही दुख अगर पाया है तो बड़ी मेहनत की होगी पाने के लिए, बड़ा श्रम किया होगा, बड़ी साधना की होगी, तपश्र्चर्या की होगी! अगर दुख ही दुख पाया है तो बड़ी कुशलता अर्जित की होगी! दुख कुछ ऐसे नहीं मिलता, मुफ्त नहीं मिलता। दुख के लिए कीमत चुकानी पड़ती है। आनंद तो यूं […]